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शुक्रवार, 29 अप्रैल 2016
मंगलवार, 19 अप्रैल 2016
आधुनिक शिक्षा
वर्षों पूर्व एक बाल कविता लिखी थी, आज मेरा बेटा उसे खोज लाया। सादर प्रस्तुत है।
भंडार परिभाषाओं का,
सूत्रों की तोता रटन्त
शिक्षा संसार आज का।
शिक्षा उसे कैसे कहें
देती न हो जो संस्कार,
उपाधि पाकर भी है मानव
काम का न काज का।
पढ़ता कभी इतिहास है,
हतोत्साहित, भ्रष्ट, व्याकुल
शिक्षित मानव आज का।
ज्ञान जिसका ध्येय हो
और लक्ष्य मानव धर्म हो,
ऐसी शिक्षा हो तो होगा
नव निर्माण समाज का।
शुक्रवार, 15 अप्रैल 2016
अक्षुण्ण प्रेरणा राम
श्रीजानकीहृदयसम्राट युगों युगों से भारतभूमि की प्रेरणा रहे हैं। जीवन का कोई ऐसा अंग नहीं जिसके समुचित संचालन के लिए उच्चतम प्रतिमान इस प्रेरणा के अप्रतिहत स्रोत से प्राप्त न हो सके। यही कारण है कि राम इस धरा के स्पंदन बन अभिवादन से अध्यात्म तक सर्वत्र व्याप्त हैं। उनके अगम विस्तार के गहन और उच्च्तर स्तरों तक पहुँचने की तो मेरी सामर्थ्य नहीं और न ही उनके ईश्वरीय स्वरुप का निरूपण कर सकने का साहस। यहाँ तो उनके सर्वसुलभ चरित से सहज प्लावित होते प्रेरणा निर्झर के अविकल प्रवाह से कुछ बूँदें संजोने की अभिलाषा ही है जो ऐसा दुस्साहस कर रहा हूँ, क्योंकि मेरा विश्वास है कि आज के जीवन में प्रेरणा की निरन्तर आवश्यकता बनी हुई है और मेरे प्रभु इतने उदार हैं कि मेरी धृष्टता देख उसी प्रकार मुस्कुरा देंगे जिस प्रकार एक पिता अपने पुत्र की चंचलता देख कर मुस्कुरा देते हैं।
राम के जीवन का प्रत्येक सोपान सम्पूर्ण मानवता के लिए अप्रतिहत प्रेरणा और सर्व हितकारी शिक्षाओं का सहज बोधगम्य उदाहरण है।
कौशल्यानन्दन, अपने प्रारम्भिक जीवन से जैसे कह रहे हों कि घरेलू परिस्थितियां विपरीत हो सकती हैं। संभव है आपको वह प्यार दुलार न मिले जिसके आप अधिकारी हैं। हो सकता है आपका परिवार आपके साथ न हो यहाँ तक कि आपके पिता भी आपके पक्ष में न हों। आप भले ही उन परिस्थितियों को परिवर्तित न कर सकते हों, किन्तु, सब कुछ विपरीत होने पर भी आप निज आचरण से उन परिस्थितियों का स्वयं पर विपरीत प्रभाव पड़ने से रोक सकते हैं। क्योंकि परिस्थितियों पर भले ही आपका वश न हो किन्तु उन परिस्थितियों पर आप कैसी प्रतिक्रिया करते हैं इस पर आपका मात्र आपका ही नियंत्रण होता है।
दशरथनन्दन, का वनगमन भली भांति स्पष्ट करता है कि पुत्र को पिता का सर्वदा ही आदर करना चाहिए और उनके यश की वृद्धि के प्रयास तथा उनके वचन का मान रखना चाहिए, चाहे पिता अपने पुत्र को वह सब न दे पाए हों जो पुत्र का अधिकार था। पुत्र को अपने वचन या कर्म से पिता को असहज स्थिति में नहीं डालना चाहिए, उसे उनके लिए धर्मसंकट की स्थिति नहीं बनने देनी चाहिए।
भरताग्रज, यह प्रेरणा देते हैं कि बड़े भाई को किस प्रकार छोटे भाई के स्नेह, मान और अधिकार की रक्षा करनी होती है। छोटा भाई भले ही स्नेहवश कुछ भी क्यों न चाहता हो, बड़े भाई को सर्वथा उसके हित और कल्याण का ही कार्य करना चाहिए।
राघव, शिक्षित होने की पराकाष्ठा हैं। इतनी प्रबल जिज्ञासा कि गुरु सर्वस्व सौंप कर कृतार्थ हों, इतना अभ्यास कि गुरु की सीमाएं असीम हो जाएँ और ऐसा लाघव कि गुरु की प्रतिष्ठा कालातीत हो जाये।
अहिल्यातारक, यह स्थापित करते हैं कि जब -जब प्राचीन मान्यताएं अमानवीय हो जाएँ तो उनका अतिक्रमण कर नवीन मर्यादाएं कैसे गढ़ी जाएँ।
सारंगपाणि, न्याय का उच्च्तम प्रतिमान स्थापित करते हैं। न्याय के समक्ष छोटा - बड़ा, ब्राह्मण -शूद्र कुछ नहीं होता। उन्होंने ब्राह्मण रावण और शूद्र शम्बूक दोनों को दण्डित किया।
रावणारि, मानव की असीमित संभावनाओं का उद्घोष हैं। वे दिखाते हैं कि बाधाएं चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हों, आपके साधन कितने ही अपर्याप्त क्यों न हों, आपके समक्ष कितनी ही बड़ी शक्ति क्यों न हो - उससे निर्भय हो जूझ जाना ही आपका कर्तव्य है।
सुग्रीवमित्र, इस बात की प्रेरणा देते हैं कि मित्र प्राप्त करने चाहिए, मित्रों के दोषों की अनदेखी कर उनका हित करना चाहिए और उनके उत्थान का प्रयास करना चाहिए।
राजाराम, यह प्रतिमान स्थापित करते हैं कि किस प्रकार एक राजा के लिए उसका स्वयं का कुछ भी नहीं होता - वह मात्र मर्यादा के समुचित पालन का प्राधिकारी, दण्डाधिकारी एवं कार्यकारी होता है। इस प्रक्रिया में उसे कुछ भी होम करना पड़ सकता है, फिर चाहे वह वस्तु, विचार या व्यक्ति उसको कितने ही प्रिय क्यों न हों।
श्रीराम, भगवान् शिव के अन्यतम भक्त हैं और महादेव स्वयं श्रीराम के। रामेश्वर ही रामकथा के प्रथम ज्ञाता हैं। इस प्रकार रामचरित इस बात का जागृत प्रमाण है कि भक्ति कैसे की जाती है -ऐसे कि भगवान् स्वयं आपके भक्त हो जाएँ।
हनमेंद्र, सिखाते हैं कि किस प्रकार अपने उपकारकर्ता का ऋण स्वीकारना चाहिए। किस प्रकार सेवक का सम्मान करना चाहिए और किस प्रकार उसे दूसरों से सम्मान प्राप्त करने का अवसर देना चाहिए।
लक्ष्मणाग्रज, अपने कनिष्ठ भ्राता को किस प्रकार स्वयं से अभिन्न मानना चाहिए, किस प्रकार उसको स्वयं को व्यक्त करने का अवसर देना चाहिए और किस प्रकार उसके दोष के लिए उसको किसी भी प्रकार से दोषी न मानते हुए भी दण्ड हेतु स्वयं को आगे कर उसकी रक्षा करनी चाहिए का उदाहरण स्वयं प्रस्तुत करते हैं।
जानकीनाथ, काल के आर- पार प्रेम का सर्वोच्च प्रतिमान रचते हैं। भार्या के प्रति एकनिष्ठ समर्पण और उसके लिए समर का आयोजन प्रत्येक में वे अद्वितीय है, अनुपम हैं, अतुल्य हैं- तभी वे जानकीनाथ हैं।
सीताराम -सीताराम -सीताराम -सीताराम -सीताराम -सीताराम - सीताराम - सीताराम - सीताराम- .....।
-रामनवमी २०७३ वि.
बुधवार, 13 अप्रैल 2016
मेरे पति - 2
पति-पत्नी किस प्रकार एक दूसरे का सम्बल बन सकते हैं
और किस प्रकार एक दूसरे के लिए सार्थक प्रेरणा हो सकते हैं, यही इस कहानी का संदेश
है। साभार : गृहशोभा, दिल्ली प्रैस।
शुक्रवार, 8 अप्रैल 2016
मेरे पति
पति-पत्नी किस प्रकार एक दूसरे का सम्बल बन सकते हैं और किस प्रकार
एक दूसरे के लिए सार्थक प्रेरणा हो सकते हैं, यही इस कहानी का संदेश है। साभार : गृहशोभा, दिल्ली प्रैस।
सोमवार, 29 फ़रवरी 2016
पहाड़ की बेटी
पहाड़ की एक लड़की की अदम्य जिजीविषा की अनुपम कथा।
24 घण्टों से अनवरत जारी थी।
पहाड़ों पर वर्षा बहुत
असुविधायें खड़ी करती है। पहाड़
ध्वस्त होते हैं और
उफनती नदियां क्या कुछ नहीं
बहा ले जाती। जन जीवन
अस्त-व्यस्त हो उठता है।
निरंतर बरसते पानी ने वृंदा
की बेचैनी बढ़ा दी थी।
वृंदा बहुत व्यग्र थी। खबर
आई थी कि चमोली में ऊपर
कहीं भूस्खलन हुआ था और मार्ग
पूर्णतः अवरूद्ध हो गया
था। वह अनंत को ले कर व्यग्र
थी। अनंत जिस क्षेत्र में
गया हुआ था वहां पर भयंकर भूस्खलन
हुआ था और
तीन गांव धरा के गर्भ में समा
गये थे। उसके पास कोई
संपर्क नहीं था। मोबाइल का
सम्पर्क पूरी तरह कट
चुका था। वृंदा का मस्तिष्क
आशंकाओं का गढ़ बना
हुआ था। उसके मन से प्रत्येक
क्षण यही दुआ निकलती
थी-हे भगवान अनंत को कुछ न
हुआ हो। जैसे-जैसे
समय गुजर रहा था वृंदा की घबराहट
और बेचैनी
बढ़ती ही जा रही थी। किस देवी-देवता
की मन्नत
वह नहीं मांग चुकी थी ? लेकिन
मन था कि किसी भी
प्रकार आश्वस्त न होता था।
अंततः वृंदा को लगा कि
अगर वह ऐसे ही निष्क्रिय बैठी
रही तो उसका सिर फट
जायेगा। तो क्या करे ? उसे
अनंत की खोज में निकलना
होगा।
उसने संस्था के और गांव के
लोगों की एक बैठक
बुलाई और उनसे अपना निर्णय
कहा । उसने उनसे
सहायता की याचना की लेकिन दो
लोगों को छोड़ कर
कोई भी साथ जाने को तैय्यार
न हुआ। वृंदा उन्ही के
साथ निकल पड़ी।
रह-रह कर होती वर्षा से चलना
दूभर हो रहा था।
मार्ग पर फिसलन थी अतः गति
बहुत कम थी। रात्रि को
उन्होने कैम्प लगाया। रात गहराती
जा रही थी। वृंदा की
आंखों में नींद नही थी। उसे
लोगों की कृतघ्नता खल
रही थी। कैसे हर व्यक्ति ने
इस अभियान पर निकलने से
जान छुड़ा ली थी। और मुंहफट
गौरा ने तो कह ही दिया
था ”तू क्यों इतनी पागल हो
रही है। कौन है वो तेरा ?“
क्या कोई किसी का कुछ हो तभी
उसकी सहायता
की जाये ? तो ये लोग कौन थे
अनंत के? क्यों वह सबके
लिये रात-दिन जुटा रहता था?
चाहता तो आराम की
जिंदगी भी काट सकता था वो?
कैसे नाशुक्रे लोग हैं?
वृंदा की हताशा जाती न थी।
कौन है वो तेरा ? इस
वाक्य में कितनी जुगुप्सा थी
कितना व्यंग्य था एक तरह
का लांछन। कौन है वो मेरा ?
उसके मस्तिष्क में अनंत
से प्रथम भेंट का चित्र उभरा।
”मामाजी बस भी कीजिए“ वृंदा
बोली, ”आपको याद
नहीं पिछली बार कैसे व्यक्ति
से बात चली थी“
”मुझे याद है बेटी वह एक नकारा
व्यक्ति था जो
सिर्फ तुम्हारी कमाई पर ऐश
करना चाहता था।“
”फिर?“
”लेकिन यह ऐसा व्यक्ति नहीं
है।“ मामाजी वृंदा को
रोकते हुये बोले, ”मैंने पूरी
जानकारी कर ली है। अनंत
एक पर्यावरणविद है और उसे पहाड़
पर रहने में कोई
आपत्ति नहीं है। बल्कि वह तो
उत्साहित है।“
”पहाड़ देखा नहीं होगा” वृंदा
व्यंग्य सहित बोली।
”हाँ, ये सच है। किन्तु मेरा
विश्वास जानो वह बहुत
ही होनहार युवक है।“
”तो फिर विदेश क्यों नहीं गया
?“
”तुम क्यों नहीं गई ?“
”मैं तो पागल हूँ। मुझे तो
पहाड़ में शिक्षा का प्रसार
करने का जुनून है।“
”वह पागल तो नहीं है लेकिन
उसे देश सेवा का
जुनून अवश्य है।
आगे के घटनाक्रम के लिए निम्नलिखित पर क्लिक करें।
https://drive.google.com/file/d/0B7OG6_zQAHC_X052Nnc4azEzUjg/view?usp=sharing
सोमवार, 15 फ़रवरी 2016
...फिर भी
- रमाकान्त मिश्र एवं श्रीमती रेखा मिश्र
कमला देवी ने
फिर से सिर झटक कर पूजा में ध्यान लगाने की चेष्टा की। किंतु व्यर्थ। मन बहुत आंदोलित
था। बार-बार झुंझलाहट होती थी और ध्यान भटकता था। बहू की मुखरता से अधिक बेटे की चुप्पी
व्यथित करती थी।
आखिर एक देवी का जागरण ही तो
करना चाहती थीं वे। इस पर बहू का मिजाज ही गर्म हो गया था- हमारे पास
इतनी उर्जा नहीं है। किसके पास समय है? फिर लाख से ऊपर का खर्चा। सब आडम्बर है। पूजा करनी है एकांत में कीजिए, मन करे तो मंदिर चली जाइए। इतना कानफोड़ करने की क्या जरूरत है।
कमला देवी आहत हो गई थी। कौन
कहता है इतनी टीम टाम करो। थोड़े में भी तो हो सकता है। पहले हर साल करते थे। मां का
नाम लेने से कल्याण ही होगा। कोई अपने ऐश-आराम को तो कह नहीं रही थी।
क्या हो गई है जिंदगी? जरा
सी इच्छा भी पूरी नहीं हो सकती। वो तो इनकी सेवा में खटती रही है। आज बच्चे बड़े हो गए तो अब मेरी क्या जरूरत? ये
ठीक ही कहते थे! कमला देवी यादों में डूब गई।
शेखर का तबादला हो गया था।
उन्होने कमला से साथ चलने को कहा तो कमला ने कहा था - अभी विशु
छोटा है, बहू नौकरी वाली है। कौन इसे पालेगा?
”यार ये इनकी समस्या है।” शेखर
ने कहा था
”कैसे बाप हो तुम?” कमला देवी
बोली थी, ”ये कोई गैर है, तुम्हारे बेटे बहू हैं।”
”हां, हैं। मैं कब मना कर रहा
हूँ, लेकिन इनके बच्चे पालना हमारा दायित्व नहीं है। हम यहां थे तब इनको सहयोग कर रहे
थे। अब मुझे बंगलौर जाना है। मुझे तुम्हारी जरूरत है।”
”तुम्हे क्या जरूरत है। तुम
कोई बच्चे हो।”
”अरे, वहां अपरिचित शहर में
मैं अकेला?”
”और ये जो अकेले रह जाएंगे?”
”ये अकेले कहां है? मियां-
बीवी है, बच्चा भी है।”
”अरे कैसी बात करते हो? कोई
बड़ा बुजुर्ग चाहिए कि नहीं। वे तो खुद बच्चो हैं। बच्चे की देखभाल क्या जाने।”
”बच्चा पैदा करना जानते हैं,
देखभाल करना नहीं जानते।”
”अरे तुम्हे क्या हो गया है?”
”मुझे कुछ नहीं हुआ। तुम्हारी
मत मारी गई है। इनको इनकी जिंदगी जीने दो। तुम मेरे साथ चलो।”
”मैं नहीं जाऊँगी। अपने बच्चों
को छोड़ कर मैं कही नहीं जाऊँगी।”
”अरे बच्चे सब कुछ है, बच्चों
का बाप कुछ नहीं ?”
”देखो फालतू की बहस तो करो
मत। मैंने कह दिया मैं नहीं जाऊँगी।”
”अरे तो वहां मेरी देखभाल कौन
करेगा?”
”तुम कोई बच्चे हो? अपनी देखभाल
खुद नहीं कर सकते हो?”
इसके बाद शेखर के लाख समझाने
पर भी कमला जाने को राजी न हुई। यहां तक कि दोनों में खूब कहा सुनी हुई और अत्यंत तनाव
के माहौल में शेखर समय से पहले ही बंगलौर चले गए।
और... एक बार गए तो फिर न तो
लौटे। न ही कोई फोन किया। न ही कोई पैसा भेजा।
कमला देवी आशा करती थी कि शेखर
जैसे यहां रहने पर खर्चा उठाते थे उसी प्रकार पैसा भेजते रहें। किंतु शेखर ने जब कुछ
न भेजा तो कमला ने उन्हें फोन किया और पैसो के लिए कहा तो उन्होने जवाब दिया-क्यों? बच्चा
दो रोटी भी नहीं दे सकता? और फोन
काट दिया। दुबारा कमला देवी फोन न कर पाई।
जब अमित पर घर का खर्चा आन
पड़ा तब तनाव बढ़ना शुरू हुआ। लेकिन पिता से खर्चा मांग सकना संभव नहीं था। इस तनाव
से वह झुंझलाने लगा और अक्सर मियाँ-बीवी में खटपट हो जाती।
जब भी दोनो में झगड़ा होता
कमला देवी सहमी रहती क्योंकि कटाक्ष और रूक्षता तो उनके हिस्से में आती ही थी। लेकिन
क्योंकि बच्चा छोटा था तो कमला उनकी जरूरत थी। जैसे-जैसे विशु बड़ा होता गया ये जरूरत
कम होती गई। फिर वह स्कूल जाने लगा तब तो कमला बिलकुल अनुपयुक्त हो गई- आखिर बच्चे
को क्रेश में या डे बोर्डिंग में डाला जा सकता था।
यों तो कमला देवी का दर्जा
नौकरानी से बेहतर कुछ भी न था लेकिन, पोते का मुँह देख कर वह सब भूल जाती और उसकी देखभाल
में मगन हो जाती थी।
किंतु धीरे-धीरे हालात बदतर
होते गए। सब कुछ करने पर भी कमला देवी को ताने ही मिलते। उनका दुःख दोबाला हो जाता
जब अमित चुप्पी साध लेता था।
और कल सांय तो हद हो गई थी।
बहू ने अपनी सहेली से कहा था-अरे यार कुछ मत पूछ। एक ही खूसट है बुढ़िया, तभी तो बाऊजी छोड़ गए। जिसकी अपने पति से न निभी उससे ये तो मैं ही हूँ जो निभा रही हूँ।
कमला का गला भर आया आंखों से
आंसू छूट गए। हे भगवान-क्या करूँ?
किसी प्रकार पूजा निबटा कर
कमला देवी उठीं। एक कप चाय बनाकर पी। कुछ खाने को मन न हुआ। मन बहुत अशांत हो रहा था।
जब बेचैनी होने लगी तो वे उठकर टहलने लगी। आखिर में सोचा चलो कुछ देर बाहर टहल लूं
तो मन को चैन आ जाए।
ताला लगाकर वे नीचे उतर आई
तो अनायास ही टहलते-टहलते मंदिर में पहुँच गई। मंदिर में इक्के दुक्के लोग ही थे। वे
भी जाकर हाल के एक कोने में बैठ गईं। हाल ठंडा था, कुछ सुकून अनुभव हुआ। तभी विद्या
देवी आकर उनके पास बैठ गईं। वे सिमरनी फेर रही थीं।
कमला देवी ने हाथ जोड़कर नमस्कार
किया।
वे मुस्कुराईं।
”कमला, आज कैसे मंदिर आ गई।”
”बीबीजी, मन नहीं लग रहा था।”
”अरे, मन कैसे लगेगा? अभी तेरी
उमर ही क्या है? ये कोई उमर थोड़ी है जोग धरने की।”
”वो बात नहीं है बीबीजी।”
”अच्छा, तो बता क्या बात है?”
कमला मौन रही। क्या बताए।
”बेटे बहू अच्छा व्यवहार नहीं
करते? बोझ समझते हैं?”
कमला मौन रही।
”घर-घर की यही कहानी है। विद्या
देवी बोली, ”लेकिन तू क्यों यहां पड़ी है। छोड़ सब। अपने मर्द के पास जा। याद रख, औरत
का साथी उसका मर्द ही होता है। औलाद उसका साथ नहीं दे सकती। कोई लाखों में एक इज्जत
करते हैं, सेवा करते हैं पर साथ वो भी साथ नहीं दे सकते। इसलिए तू शेखर के पास जा। यहां
क्या कर रही है ?”
कमला चुप ही रही।
”तूने शेखर से कोई झगड़ा तो
नहीं कर रखा” विद्या देवी ने पूछा।
”फिर भी चली जा” कमला के मौन
से ही अनुभवी विद्या सब समझ गईं, ”अपने मर्द से क्या मान करना। दो खरी खोटी कहेगा तो
सुन लेना। तेरा मर्द है कोई गैर तो नहीं? यहां औलाद की सुनती है वहां मर्द की सुन लेना।
आखिर गलती तो तेरी ही है जो यहाँ पड़ी है।”
कमला के आंसू बहने लगे। विद्या
देवी ने उसके आंसू पोछे।
”तू मेरी बेटी की तरह है। मैं
शेखर को जानती हूँ। बहुत अच्छा लड़का है। तू चली जा।”
”पांच साल हो गए, फोन तक नहीं
किया।” कमला अब अपने को रोक न पाई। रो पड़ी।
विद्या देवी उसे अपने गले से
लगाए रहीं। वो रोती रही। फिर कुछ जी हल्का हुआ।
”सुन, तू फोन कर। तेरे पास
नम्बर तो है?”
कमला ने इंकार में सिर हिलाया।
”शेखर किस विभाग में है।”
”सी डी ए एयर फोर्स में।”
”किस पद पर है?”
”जब गए थे तब डबल ए ओ थे।”
”तू रूक” विद्या देवी ने अपने
झोले से फोन निकाला और अपने बेटे को फोन किया।
”विक्की, देख बेटा एक अर्जेंट
काम है। तेरा एक दोस्त है न बंगलौर में क्या नाम उसका हां, विराट, तू जरा उसे फोन कर
के कह कि बंगलौर में सी डी ए (एयरफोर्स) आफिस में एकाउण्ट आफिसर है शेखर अग्रवाल उसे
मैसेज दे दे कि वह मेरे फोन पर अभी बात करें।”
”नही, कुछ बात हैं। बस तू ये
काम कर अभी का अभी।”
इसके बाद करीब दस बारह मिनट
बाद ही विद्या देवी का फोन बज उठा। फोन पर शेखर था।
”शेखर बेटा मैं विद्या आंटी
बोल रही हूँ...................... खुश रह बेटा। तूने पहचान लिया न आंटी को?" उधर से उत्तर सुन कर फिर बोलीं, "बेटा, तेरे से एक
काम है। तू मेरी एक रिक्वेस्ट मानेगा?”
”तू अच्छा बेटा है। हाँ...हाँ
मैं चाहती हूँ तू कमला से बात कर, उसे अपने पास बुला ले।”
”वो यहीं है मेरे पास तू उससे
बात कर ले। उसे अपनी गलती का अहसास हो गया है, तू उसे माफ कर दे। मैं उसकी ओर से माफी
मांगती हूँ। ...नहीं...नहीं... तुम लोग मेरे बच्चे की तरह हो- ले बात कर।”
कमला को फोन देकर विद्या देवी
उठ गई। कमला फोन पर कुछ बोल न पाई। बस रोती रही।
”अरे अब रोना बंद कर बेवकूफ।
अक्ल आ गई तो ठीक है” दूसरी ओर से शेखर ने कहा- ”मैं उसे फोन कर देता हूँ, तुझे ट्रेन
में बैठा देगा। रोती क्यों है अभी तो मैं जिंदा हूँ।”
कमला फफक कर रो पड़ी।
x x x x
”आपने पापा को फोन किया था?”
अमित ने पूछा।
”क्यों?” कमला ने रूक्षता से
कहा।
”उनका फोन आया था, उन्होने
आपको बंगलौर बुलाया है।”
कमला चुप रही।
”जरूर इन्होने पापा से शिकायत
की होगी।” बहू बोली, ”आपको शर्म नहीं बाती जरा-जरा
सी बात की लगाई -बुझाई करते हुए।”
कमला चुप ही रही। तभी फोन की
घंटी बजी। शेखर का फोन था। पुत्र ने मोबाइल उसकी ओर बढ़ा दिया।
”हैलो”
”हां, सुनो मैंने कल की राजधानी
में आरक्षण करा दिया है। शाम को 3:30 बजे हजरत निजामुद्दीन से चलेगी और परसों शाम को
4:00 बजे यशवंतनगर पहुँचेगी। तुम तो कभी राजधानी से चली नहीं हो तो इसलिए बता रहा हूँ
कि इसमें चाय नाश्ता खाना सब फ्री होता है। वैसे फ्री तो नहीं होता, टिकट में उसके पैसे
पहले ही ले लेते हैं पर लम्बी यात्रा में कोई दिक्कत नहीं होती। ए सी है तो कम्बल बगैरह
लेकर मत चलना। वहीं मिल जाएगा। ज्यादा की जरूरत हो तो मांग लेना। सामान कम रखना। यहां
बंगलौर में ठंड नहीं पड़ती है तो स्वेटर बगैरह मत लाना।”
”जी।”
”अच्छा, फोन अमित को दो।”
फिर शेखर अमित को कुछ निर्देश
देने लगे।
”ये एकदम अचानक पापा को क्या
हुआ?” बहू बोली थी।
”पता नहीं”
”लेकिन विशु का क्या होगा?
अभी वो अकेले रहने के काबिल नहीं।”
”यार तुम कुछ दिन की छुट्टी
ले लो।”
”छुट्टी? इंपोसिबिल। तुम पापा
को फोन करो। अभी मम्मी को नहीं भेज सकते।”
”मैं नहीं रूक सकती।” कमला
ने रूक्ष स्वर में कहा।
”आपको हमारी कोई पर्वाह नहीं?
आपको इस नन्हे से बच्चे की कोई पर्वाह नहीं जो हमेशा आपसे चिपका रहता है।दादी-दादी
कहते जिसकी जबान नहीं थकती।”
”पर्वाह न होती तो इतने दिन
अपने पति की अवहेलना कर यहां क्यों पड़ी रहती?” कमला देवी बोली।
”तो अब?... अब क्या हो गया?”
”जो मेरा यहां का दायित्व था
मैंने पूरा कर दिया। अब मैं तुम लागों पर भार हूँ। विशु बड़ा हो गया है। उसका अधिकांश
समय स्कूल में कटता है। वे वहां अकेले हैं। यहां पर तुम लोगों का पूरा परिवार है। अब
मेरी वहां जरूरत है।”
उसके जवाब ने तो जैसे सबकी
बोलती बंद कर दी।
”लेकिन ये स्कूल से आकर कया
करेगा? कहां रहेगा?
”उसकी तुम व्यवस्था करो। अब
वह छः साल का हो गया है।”
”लेकिन आप कुछ दिन और रूक जाइए।
कम से कम विशु की कोई व्यवस्था होने तक।”
एक क्षण को कमला कुछ बोल न पाई। लेकिन तभी उसके दिमाग में कई बातें कौंध गईं। तत्काल ही उनके मुख से निकला,”एक बार मैं उनकी अवहेलना कर
चुकी हूँ, दुबारा ये गलती नहीं कर सकती।”
फिर सब मौन हो गए। अत्यंत तनाव भरे माहौल में कमला देवी अगले रोज बैंगलोर के लिए रवाना हो गईं।
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अंतिम चाय सर्व कर सब कैटरिंग
वाले पैन्ट्री में चले गए और कीर्तन करने लगे। कीर्तन समाप्त होते होते ट्रेन यशवंतनगर
स्टेशन पर पहुँच गई। बैग कंधे पर लटका कर सूटकेस खींचते हुए वह धीरे-धीरे लाइन में
लगी-लगी प्लेटफार्म पर उतर गई। सामान लेकर वह ट्रेन से थोड़ी हट कर खड़ी हो गई। तभी
उसकी दृष्टि शेखर पर पड़ी।
शेखर कुछ दुबले लग रहे थे।
गंगा जमुनी केश, घनी लेकिन छोटी मूँछें भी गंगा जमुनी हो रही थीं। सफेद जमीन पर ग्रे
चेक की कमीज और मिलिटरी ग्रीन रंग की पेंट में कमला को शेखर अत्यंत स्मार्ट लगे। उसकी आंखे
डबडबा आई। गला रूंध गया। तभी शेखर की नजर कमला पर पड़ी और वे थमक कर खड़े हो गए। फिरोजी
जमीन पर पोल्का डॉटस की शिफान की साड़ी में कमला उन्हें बेहद खूबसूरत लगी। वे लपक कर
उसके पास आ गए फिर उसे देख कर आंसू भरी आंखों से मुस्कुराए।
कमला सिसक कर उनसे लिपट गई।
कुछ देर दोनों यो ही लिपटे
खड़े रहे। फिर शेखर ने कुली को सामान उढ़ाने का इशारा किया और कमला को कंधे से थाम
कर बाहर की ओर चल पड़े।
घर तक पहुँचने तक दोनो मौन
रहे।
घर पहुँचकर अनायास ही दोनो
आलिंगनबद्ध हो गए। फिर तो समय जैसे वापस 30 साल पहले के काल में पहुँच गया। दोनों जैसे सद्यविवाहित नवयुगल हों। एक दूसरे में खोते चले गए। संतुष्टि भरे अभिसार के पश्चात
दोनों का तन मन शीतल हो गया। स्नान करने के पश्चात वे रात्रिभोजन के लिए बाहर चले गए।
साढ़े दस बजे के पश्चात लौटे
वो पुनः एक दूसरे में खो गए और फिर गहरी नींद में उतर गए। दोनों को ही ऐसी गहरी नींद
वर्षों बाद आई थी। प्रातः चाय पीने के उपरांत दोनों में बात होने लगी।
”मैंने अपना तबादला स्वयं करवाया
था।” शेखर ने राज खोला।
”क्यों?”
”क्योंकि तुम मुझे बिल्कुल
विस्मृत कर चुकी थी। बच्चे की सार संभाल और घर गृहस्थी में थक कर चूर हो जाती थी तो
मुझे लगा कि हमें अब अपनी गृहस्थी अलग करनी ही होगी। वरना घुटन के कारण मुझे कोई न
कोई भयंकर बीमारी हो जाएगी।”
”कभी क्रोध आता था कभी दया।
आखिर अब तुम युवा तो नहीं रह गई थी तो उतनी उर्जा भी तुम्हारे अंदर नहीं बची थी। जितना
काम तुम पहले सहजता से कर लेती थी उतना अब करना संभव नहीं था। फिर मैं चाहता था कि
जब हम युवा थे तब तो घर की जिम्मेदारियों में ही उलझे रह गए, कुछ एन्जवाय न कर पाए
तो अब एन्जवाय करें।”
”मुझे अपराध बोध होता था कि
तुमसे विवाह कर तुम्हे लाया तो किचन थमा दिया। तब से अब तक किचन ही तुम्हारा ठिकाना
बन गया। पहले सास की सेवा की अब बहू की कर रही थी। मैं चाहता था कि तुम्हें इससे मुक्ति
दिलाऊँ और दुनिया घुमाऊँ। लेकिन दिल्ली में रहते तो ये संभव नहीं था। क्योंकि तुम इसके
लिए तैयार ही नहीं थी।
”इसलिए तबादला करवाया लेकिन
तुम्हारे इंकार से सब व्यर्थ हो गया। अब तबादला तो हो ही चुका था उसे रोका नहीं जा
सकता था क्योंकि वो तो मेरे ही कहने पर हुआ था, अतः मैं बंगलौर चला आया। लेकिन बहुत
दुखी रहा। फिर मैंने सोचा कि तुम तो आओगी नहीं क्योंकि तुम्हारी दृष्टि में औरत की
जिंदगी बच्चे पालने में ही है। तो मैंने अपने समय का सदुपयोग करना शुरू किया। कन्नड़
सीखी, तमिल सीखी और लिखना शुरू किया। अब तक चार उपन्यास लिख कर छपवा चुका हूँ। पहले
समय नहीं कटता था फिर इस सब में इतना व्यस्त हो गया कि पूछो मत। लेकिन यार हाँ..बेचैनी
फिर भी रहती थी। कहीं न कहीं एक कसक हमेशा कचोटत़ी रहती थी।”
कमला मंत्रमुग्ध सी सुन रही
थी।
”तुम कितना और क्या सोचते थे
और मैं कभी कुछ नहीं समझ पाई। लेकिन कल रात मुझे लगा कि सुख तो मुझे तुम्हारे साथ ही
मिल सकता है।”
”ये तुम ठीक कहती हो। कल तुम्हारे
आने के बाद से समय तो जैसे पंख लगाकर उड़ रहा है। कल रात जितनी गहरी नींद आई पिछले
पांच सालों में कभी नहीं आई थी।”
”मैं भी यही कहना चाहती थी।
इस समय मैं खुद को कितना तरोताजा और युवा अनुभव कर रही हूँ बता नहीं सकती। जैसे बिलकुल
हल्की हो गई हूँ, हवा में उड़ रही हूँ।”
शेखर ने पास खिसक कर कमला को
अपने साथ सटा लिया।
”अब हम एक सप्ताह तक तुम्हें
बंगलौर और मैसूर घूमाएंगे।”
”हूँ।”
”हनीमून मनाने का इरादा है।”
”अब?”
”देर से सही। सुबह का भूला
अगर शाम को घर पर लौट आए तो उसे भूला नहीं कहते न।”
कमला ने अत्यंत अनुराग से शेखर
को देखा और सहमति में सिर हिला दिया।
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