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गुरुवार, 4 अक्टूबर 2018

जादुई चश्मे


लब्धप्रतिष्ठ लेखिका डॉ मंजरी शुक्ला का बाल कथा संग्रह "जादुई चश्मे" अभी सूरज पॉकेट बुक्स द्वारा प्रकाशित
हुआ है। इस संग्रह में १४ प्रेरक बाल कथाएं संकलित हैं। प्रत्येक कहानी अत्यंत रोचक शैली और सरल किन्तु समृद्ध भाषा में लिखी गयी है। प्रत्येक कहानी बाल मन में मानवोचित व्यवहार के संस्कार रोपित करने में सक्षम है।  

इन कहानियों के भावों के अनुरूप सुंदर चित्र इस संग्रह के सौन्दर्य, प्रभाव और रोचकता में अभिवृद्धि करते हैं।  यह संग्रह बच्चों के मन में पठन- पाठन की रूचि विकसित करने और उनको उनको एक अच्छा मानव बनने का संस्कार देने में सहायक होगी। 


आज अंग्रेजी माध्यम से पढने वाले बच्चों में हिंदी के प्रति कोई रूचि विकसित नहीं  हो पा रही  है।  यह पुस्तक बच्चों में हिंदी के प्रति रुझान बढाने में उपयोगी  सिद्ध होगी। इसलिए ये किताब बच्चों के लिए सर्वोत्तम उपहार है। 


डॉ शुक्ला अरसे से बाल साहित्य के सृजन में जुटी हुई हैं, हम उनसे ऐसी ही और रचनाओं की अपेक्षा करते हैं क्योंकि हिंदी में स्तरीय बाल साहित्य की नितांत कमी है। 


इस स्तरीय प्रकाशन के लिए लेखिका, चित्रकारों, संपादकों और प्रकाशक सभी को ढेरों बधाइयाँ। 



बुधवार, 3 अक्टूबर 2018

असाधारण संगीतकार की उतनी ही असाधारण जीवनी

अमर संगीतकार श्री ओ. पी. नैय्यर के असाधारण जीवन पर केन्द्रित पुस्तक "दुनिया से निराला हूँ, जादूगर  मतवाला हूँ " उनके व्यक्तित्व की भांति असाधारण है।  फिर चाहे वह पुस्तक का असाधारण आकार हो या उसकी प्रस्तुति।

जब पहले  पहल इस पुस्तक को पढ़ा तो मंत्रमुग्ध रह गया।  पुस्तक जो कि ४१ छोटे -छोटे अध्यायों में अत्यंत लाघव से प्रस्तुत की गयी है, एक ऐसा खज़ाना है जो कि इस महान  संगीतकार के प्रशंसकों को तो मुग्ध करेगी ही, मुझ जैसे संगीत के ज्ञान से शून्य व्यक्ति को भी अपने मोहपाश में जकड़ लेगी।
और ऐसा जकड़  लेगी कि छोड़ते न बनेगी।

जो लेखक श्री पराग डिमरी जी से परिचित हैं, वे जानते हैं कि पराग जी की वाणी पर्वत से निसृत होते निर्झर की भांति द्रुत प्रवाहमयी होती है।  आश्चर्य यह है कि पुस्तक में भी यह गति आद्योपांत कहीं भी बाधित नहीं होती वरन तीव्र ही होती है.
इस पुस्तक में शब्दों की बाजीगरी तो आप कहीं न पाएंगे किन्तु शब्दों का प्रवाह आपको साँस लेने की मोहलत भी न देगा।

दूसरी जो बात चकित करती है, वह है लेखक का निस्पृह रवैया। लेखक ने अपने महबूब संगीतकार को सही ठहराने के तर्क नहीं गढ़े।  उन्होंने  उन्हें वैसा ही प्रस्तुत किया, जैसा तथ्यों में पाया। ये एक दुर्लभ उपलब्धि है।  इतने पर भी लेखक का उनके प्रति सम्मान कहीं कम नहीं होता बल्कि वह पाठक के समक्ष  भी  उतने ही सम्माननीय बने रहते हैं।  यहाँ पर यह भी दृष्टव्य  है कि लेखक ने उनके विरोधियों या उनसे असहमत लोगों को भी कहीं नकारात्मक चित्रित नहीं किया है बल्कि यह लिखा है कि वे भी ग़लत नहीं कहे जा सकते।  दो विपरीत पक्षों को सामान रूप से सकारात्मक चित्रित कर पाने में लेखक को असाधारण सफलता मिली है।  कमाल का कौशल है, अतुल्य। 

इस विषय में यह भी उल्लेखनीय है कि लेखक ने अनेक ऐसे मामलों में, जो विवाद उत्पन्न कर सकते थे, अत्यंत सतर्कता का परिचय दिया है और बिना तथ्यों का लोप किये असाधारण संतुलन साधा है।  लेखक चाहते  तो इन विवादस्पद विषयों को कथ्य को रसीला और रंगीन बनाए में प्रयुक्त कर लेते, इससे पुस्तक को कहीं अधिक प्रचार मिलता क्योंकि इन बिन्दुओं पर खूब चर्चा  होती। अगर लेखक ने ऐसा किया होता तो आज चहुँ और लेखक और पुस्तक की ही चर्चा हो रही होती। किन्तु लेखक इस प्रलोभन से बच कर  निकल गए।  इतना संयम साध  लेने के लिए लेखक को साधु-साधु कहने को जी करता है।  लेकिन इतना होने पर भी तथ्यों को छिपाया नहीं गया बल्कि बड़ी निस्संगता और निष्पक्षता से यथावत प्रस्तुत कर दिया गया है।
जब बात तथ्यों की आती है तो कहना होगा कि लेखक ने पूरी पुस्तक में तथ्यों की झड़ी लगा दी है, जो उनके वर्षों के अनथक परिश्रम की परिचायक है। अगर लेखक पराग डिमरी न होते तो इतने तथ्यों से तो सत्खंडी जीवनी लिखी जाती। तथ्य अगर द्रव होते तो निश्चय जानिये पुस्तक से टपक रहे होते, बह रहे होते।

लेकिन इतनी शानदार किताब में प्रूफ की गलतियाँ बहुतायत में हैं जो कभी कभी व्यवधान उत्पन्न करती हैं। पुस्तक में चित्रों पर भी पुस्तक के डिज़ाइनर द्वारा  कोई भी काम नहीं किया गया है।  कुछ चित्र मूल रूप में  अच्छे  नहीं होंगे, कुछ ख़राब भी हो सकते हैं  किन्तु इतने पर भी उनकी गुणवत्ता और प्रस्तुति में सुधार अपेक्षित है। आशा है कि पुस्तक के रीप्रिंट में इन बातों का ध्यान रखा जायेगा जो पुस्तक की शोभा में वृद्धि करेगी।

निश्चय ही अब भी  बहुत  से तथ्य/प्रसंग छूट गए होंगे जिन्हें लेखक पुस्तक के आगामी संस्करणों में सहेज सकेंगे।

कामना है कि यह संग्रहणीय पुस्तक हार्डबाउंड में अति शीघ्र आये।

मंगलवार, 19 दिसंबर 2017

वो फिर नहीं आते

मानव, जीवन की आपाधापी में अपनी छोटी -छोटी इच्छाएं स्थगित करता चलता है। जबकि जीवन में कभी कल नहीं होता जब भी होता है आज ही होता है।  छोटी - छोटी  खुशियों के इसी स्थगन पर एक  मार्मिक कहानी।

 वो फिर नहीं आते 

मंगलवार, 5 सितंबर 2017

अम्मा - मेरी प्रथम शिक्षक


सारी सृष्टि में माँ ही प्रथम शिक्षक है किन्तु अम्मा बिलकुल अलग थीं.

मैं सदैव कक्षा में ही काम निपटाने वाला विद्यार्थी था. कक्षा में जब अध्यापिकाएं प्रश्न लिखाती मैं साथ ही साथ उनके उत्तर भी लिख लेता था. गणित या अंग्रेजी में तो कुछ भी समय नहीं लगता था. बाकी विषय भी मेरे लिए सरल होते थे और मैं आगे-पीछे उन्हें वहीँ निपटा लेटा था. लेकिन फिर भी कभी-कभी जब मैं कक्षा में काम नहीं निपटा पाता था तब मैं उन्हें कभी घर में नहीं करता था. लेकिन अगले दिन जब मैं कक्षा में कॉपी खोलता तो मेरा काम हुआ मिलता और वो भी मेरे हस्तलेख में. ये कारगुजारी अम्मा की होती थी. वे कब मेरे गृहकार्य को देख लेती थीं, मैं कभी नहीं जान पाया.

अम्मा किस्से कहानियों की चलती फिरती ब्रह्माण्ड कोश थीं. विश्वकोश तो उनके विशद ज्ञान के समक्ष बहुत बौना है. उनको न जाने कितनी कहानियां कंठस्थ थीं. यही नहीं, एक कहानी के कितने संस्करण वे सुना सकती थीं ये तो कोई नहीं बता सकता. उन्होंने दूध ही नहीं पिलाया, कहानियां भी पिला दीं.

हमारी मान्यताएं, हमारे संस्कार और हमारी भाषा मैंने ही नहीं मेरे बेटों ने भी अम्मा से ही सीखीं.

 आस्था का सबक मैंने उन से ही सीखा. अम्मा प्रायः नित्य ही अनाज साफ करने बैठती थीं. उनके बरामदे में बैठते ही गौरैयों का एक झुण्ड सा आ कर बैठ जाता था. अम्मा कुछ ख़राब तो कुछ अच्छा अनाज भी फर्श पर डाल देती थीं और गौरया उनको खाती रहती थीं. वे अम्मा से बिलकुल नहीं डरती थीं, बिलकुल उनके पास मंडराती रहती थीं. और जब अम्मा कहतीं- अच्छा अब जाओ, तो जाने कैसे वे सारी की सारी गौरैया उड़ जातीं, जैसे उनकी भाषा समझती हों.  

अम्मा उनसे बात भी करती रहती थीं. मैं हँसता था. अम्मा क्या ये तुम्हारी भाषा समझती हैं? अम्मा कहती- हाँ. बिलकुल समझती हैं. मैं हँसता था.

सम्भवतः १९७४ की बात है. मेरे पिता का स्थानांतरण हो गया था और वे गोरखपुर चले गये थे. इसी बीच करवा चौथ का त्यौहार आया. इसमें सीक की आवश्यकता पड़ती है. उन दिनों आजकल की तरह ये सब बाज़ार में नहीं बिकता था. पिता जी ही इसका इंतजाम कर देते थे. लेकिन अब क्या हो? अम्मा खिन्न सी थीं. लेकिन संध्या को क्या देखते हैं कि बरामदे में सात सींके बिलकुल सही स्थिति में रखी हुयीं थीं. अम्मा प्रसन्न हो गयीं. वे समझ गयीं कि ये किसकी कारस्तानी है. उन्होंने रसोई से अनाज लाकर डाला. तत्काल गौरैया आ गयीं. जब वे दाना चुगने लगी तब अम्मा सींक ले कर भीतर गई. मैंने बहुत बड़ा सबक सीख लिया था.

अम्मा, मैं जानता हूँ तुम यहीं हो.

जब भी मैं कुछ लिखने बैठता हूँ और कहीं अटक जाता हूँ तो फिर अचानक लिखते-लिखते ही कुछ इतना बेहतरीन लिखा जाता है कि जो मैं कभी सोच भी नहीं सकता.

अम्मा, मैं जानता हूँ तुम यहीं हो.

रविवार, 8 जनवरी 2017

एक आभार संवाद - श्री पराग डिमरी

नए वर्ष पर मेरे मित्र  श्री पराग डिमरी का एक अनुपम, अद्भुत, सार्थक और सजीव सन्देश प्राप्त हुआ जिसने मुझे मुग्ध कर दिया और मैं इस विलक्षण सन्देश को आप सब से बाँटना चाहता हूँ।  
एक आभार  संवाद
श्री पराग डिमरी 
   उन कुछ चुनींदा विशिष्ट जनों के साथ,जिन्होंने  कहीं  ना कहीं, किसी ना किसी रूप में इस अदने से इंसान को  प्रभावित किया है।                    जीवन एक  रेल यात्रा का सफर ही तो है, जिसमें  भांति भांति के पड़ाव हैं, मंजिलें हैं। कुछ घटनाएँ, दुर्घटनाएं क्या हो जाती हैं तो अक्सर रास्ते ,मंजिलों में परिवर्तन भी आ जाता है।
 जनम के साथ ही हम भी इस  यात्रा में शामिल हो गए क्योंकि यहाँ हमारे लिए जगह बनायी टिकट खरीदकर   हमारे माता -पिता ने। काफी समय तक हम  इसी सोच के साथ ही यात्रा करते रहे  कि वे ताउम्र इस सफर में हमारे साथ  बने रहेंगे। ,किंतु कुछ पड़ाव,स्टेशन ऐसे भी आयेंगे या शायद आ भी चुके हैं कि जब  उन्हें हमें इस यात्रा में अकेला छोड़ कर  अलग हो जाना पड़ेगा या वो शायद  हमसे जुदा हो भी चुके हैं।
        समय गुजरेगा,दौर बदलेंगे, बहुत सारे अन्य  इस यात्रा में हमारे  सहयात्री बनेंगे और वो हमारे जीवन में बड़े महत्वपूर्ण साबित भी  होने लगेंगे जैसे कि निकट संबंधी(भाई,बहन इत्यादि), दोस्त, औलाद, सहकर्मी और हमारा  प्यार भी।  इनमें भी कई, आने वाले समय में  इस सफर में  हमसे जुदा होने लगेंगे और  एक ना भरने वाला शून्य (vacuum)  छोड़ जायेंगे, कुछ  निरंतर चल रही यात्रा से  इस तरह से  अलग होंगे की  हमें अहसास  भी  नहीं होगा   कि  वे अब हमारे  हमराही नहीं  रहे और  उनकी  सीट/जगह खाली हो चुकी है।
इस यात्रा में सुख दु:ख का  मिलने,बिछड़ने का, सपनों के बुनने टूटने का, खुश नाराज़ होने का भी समावेश रहेगा। कभी सफर धीमी गति से  चलेगा, कभी  उम्मीद से ज्यादा  रफ्तार  से  चलेगा, कोई भी यह नहीं जानता है कि कब उसे   इस  सफर में अपनी सीट छोड़नी पड़ सकती है,  कब इस यात्रा से अलग हो जाना पड़ेगा, इस अनिश्चितता के एक ही मायने हैं  कि  जब  इस सफर को तिलांजली दे कर अपनी सोट खाली करना पड़े तो पीछे ऐसी सुनहरी यादों का संसार छोड़ कर जाए कि हम रहे ना रहे, हमसे जुड़ी यादें उस यात्रा में निरंतर सफर करती रहें।
        मुझे भी नहीं  पता है कि इस यात्रा को  त्यागने की  मंजिल कब आएगी किंतु फिलहाल मैंने उस टिकट को अपनी मुठ्ठियों में  भींच कर रखा है जो कि  मेरे माता पिता ने मुझे दिया था और इस रेल यात्रा के विभिन्न पड़ावों का असीम आनन्द उठा रहा हूं।
किंतु इस यात्रा में कुछ लोग ऐसे भी होंगे जो कि  इस यात्रा में आपके साथ लंबे समय तक बने रहेंगे, आप जैसे हैं,उसी रूप में आपको स्वीकार करेंगे, आपकी गलतियों ,कमियों के साथ भी आपके साथ संबंधों की गरमाहट को बनाए रखेंगे।
उपर लिखी बातों के मद्देनजर आपका  विशेष  आभार इस यात्रा में एक महत्वपूर्ण और प्रेरणादायक सहयात्री बने रहने  के  लिए और जीवन के  कई पहलुओं को विशिष्ट रूप से  प्रभावित करने के लिए।
मैं आपको एवं आपके परिवार को इस सफर के बाकी पड़ाव के हर्ष, उल्लास एवं आनन्द से सराबोर रहने के लिए ईश्वर  से  प्रार्थना करता हूं। इस यात्रा में ढेरों सफलता, स्नेह की  प्राप्ति हो, इसी कामना  के  साथ।
आपका
पराग 



इक्कीसवीं सदी को इक्कीसवां साल लग रहा है...!

  इक्कीसवीं सदी को इक्कीसवां साल लग रहा है...! इसलि ए नहीं कि आज की तारीख चालू साल की आखिरी तारीख है और जिसे फिर दोहराया नही जा सकगा, इसलिए ...